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नासिरिया फाउंडेशन ने उर्दू में डिजिटल पत्रकारिता पर किया आयोजन

किशनगंज 27 फरवरी 2020 (हंस) भारत सरकार के मानव संसाधन और विकास मंत्रालय (HRD) के तहत चलने वाले NCPUL के वित्तीय सहायता से एक-दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन बुधवार को नासिरिया फाउंडेशन द्वारा किशन बिहार के ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल में किया गया। सेमीनार का विषय था ‘उर्दू में डिजिटल पत्रकारिता की आधुनिक आवश्यकताएं’, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों के प्रतिष्ठित पत्रकारों और विद्वानों ने भाग लिया। मीडिया शोध के क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न विद्वानों द्वारा शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए।

सेमीनार की शुरुआत नासिरिया फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ। जलीस अख्तर नसीरी के स्वागत भाषण के साथ हुई, जिसमें प्रतिभागियों का स्वागत किया गया और मौजूदा दौर के डिजिटल पत्रकारिता के महत्व और उर्दू जैसी आम बोल चाल की भाषा में डिजिटल पत्रकारिता की आवश्यकताओं पर प्रकाश डाला गया।

प्रसिद्ध शिक्षाविद् श्री मौसुफ सरवर के उद्घाटन भाषण से उन्होंने भारत में पत्रकारिता और उर्दू पत्रकारिता के संक्षिप्त इतिहास पर प्रकाश डाला। डिजिटल पत्रकारिता के वैश्विक परिदृश्य पर बात करते हुए, उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के प्रभाव में भारत में उर्दू डिजिटल पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और इसकी संभावनाओं का उल्लेख किया।

प्रसिद्ध समाचार पोर्टल ‘बियॉन्ड हेडलाइंस’ के संपादक और जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता, अफरोज आलम साहिल ने कहा है कि डिजिटल पत्रकारिता के चार घटक हैं: सूचना, पैकेजिंग यानी प्रस्तुति, टेक्नॉलजी और आय। “आजकल हम जो समाचार उपभोग करते हैं, वह वास्तव में सरकारी एजेंसियों के पीआर उत्पाद हैं। वास्तविक समाचार वह है जो लोगों से छिपा हुआ है। एक पत्रकार का मुख्य कार्य वास्तविक समाचार को बाहर निकालना और उसे जन-जन तक फैलाना है। सूचना का अधिकार (अधिनियम) इस काम में सबसे प्रभावी उपकरण हो सकता है। उन्होंने कई उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि कैसे एक पत्रकार के लिए आरटीआई उपयोगी हो सकता है।

द वायर उर्दू (ऑनलाइन न्यूज पोर्टल) के पूर्व संपादक और दिल्ली स्थित फ्रीलांस पत्रकार महताब आलम ने डिजिटल पत्रकारिता की जरूरतों और चुनौतियों के बारे में बताया और कहा कि डिजिटल पत्रकारिता टेक्नॉलजी पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि इनोफ़रमेशन टेक्नॉलजी, विशेष रूप से इंटरनेट और मल्टीमीडिया का उपयुक्त उपयोग डिजिटल पत्रकारिता की बुनियादी जरूरतों में से एक है। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल पत्रकारिता रियल टाइम में होना चाहिए ताकि इसकी उपयोगिता और प्रासंगिकता बरकरार रहे। उर्दू में डिजिटल पत्रकारिता की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक अंग्रेजी भाषा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विकसित की गई है जबकि उर्दू भाषा और लिपि की आवश्यकताएं काफी अलग हैं, इसलिए टेक्नॉलजी को उर्दू लिपियों की आवश्यकताओं के साथ संगत करनया जरूरी है। महताब आलम ने कहा कि उर्दू में डिजिटल पत्रकारिता को भाषा के मामले में उदार होना चाहिए। पाठकों को आसानी से समझ में आने वाली भाषा का उपयोग इस मौखिक माध्यम को जीवित रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

किशनगंज के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ अख्तर-उल-इमान ने कहा है कि समाचार मनुष्यों की एक स्वाभाविक आवश्यकता है। समाचारों की चाहत होना जीवन का एक लक्षण है। उन्होंने वर्तमान उर्दू भाषी दुनिया के बीच सही ज्ञान और जानकारी में रुचि की कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उर्दू भाषा को जीवित रखना महत्वपूर्ण है और उर्दू को रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करना भी महत्वपूर्ण है।
किशनगंज के पुलिस अधीक्षक (एसपी) श्री कुमार आशीष, जिन्होंने इस आयोजन के विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया, ने कहा कि मुफ्त डेटा के इस युग में समाचार के रूप में लोगों तक जो मालूमात पहुचाई जा राही है वह बहुत चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि इंटरनेट डेटा मुफ्त हो सकता है लेकिन हमारे साझा और समृद्ध सांस्कृति अनमोल हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का गैर जिम्मेदाराना उपयोग समाज के लिए बेहद हानिकारक है और यह आसानी से अराजकता को बढ़ावा देता है। इसलिए समाचार डेलीवेरी करने से पहले अपनी जिम्मेदारी को अच्छी तरह समझना महत्वपूर्ण है।

सेमीनार के आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए उर्दू दैनिक कौमी तन्ज़ीम के ब्योरों चीफ श्री अली रेजा सिद्दीकी ने कहा है कि उर्दू पत्रकारिता किसी भी भाषा में की जाने वाली पत्रकारिता से पीछे नहीं है। उन्होंने नई पीढ़ी से पत्रकारिता को पेशे के रूप में चुनने का आग्रह किया और इसे निष्पक्ष और तटस्थ रखने पर जोर दिया।
पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ। ओज़ेयर इज़राइल जिनको उर्दू मीडिया में शोध का अच्छा-खासा अनुभव है, ने डिजिटल पत्रकारिता के गुणों का उल्लेख किया और कहा कि पत्रकारिता के इस रूप में पूँजीपतियों का कोई एकाधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया किसी तरह सरकारी तंत्र के अलोकतांत्रिक नियंत्रण से बाहर है। हालांकि, उन्होंने इस तथ्य पर चिंता व्यक्त की कि पाठक पत्रकारिता के डिजिटल रूप के माध्यम से प्राप्त कंटेन्ट को अब भी उतने गंभीरता से नहीं लेले जितना कि प्रिन्ट की खबरों को लेते हैं। उन्होंने कहा कि “डिजिटल पत्रकारिता में निवेश की कमी भी चिंता का विषय है”।

कोलकाता के प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर, डॉ। सज्जाद आलम रिज़वी ने अपने की-नोट अड्रेस में एक व्यापक चर्चा की और बुनियादी घटकों के साथ-साथ पत्रकारिता के बौद्धिक मूल पर प्रकाश डाला। उन्होंने पत्रकारिता के राजनीतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से बात करते हुए पत्रकारिता और अर्थशास्त्र के बीच संबंध का जाएजा लिया। उन्होंने पत्रकारिता में नैतिकता की भूमिका पर जोर दिया।

नासिरिया फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ। जलीस अख्तर नसीरी के धन्यवाद से सेमनार को समाप्त क्या गया, जिन्होंने विशेष रूप से उन लोगों का आभार व्यक्त किया जो अंत तक सेमीनार में बैठे रहे। सेमीनार के संचालक ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल के डाइरेक्टर श्री तफहीमुर रहमान ने इस सूचनात्मक सेमीनार के आयोजन के लिए लिए नासिरिया फाउंडेशन का शुक्रिया अदा किया।

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